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काहे विलंब करो आवन मे सीता जनक दुलारी
रघुवर व्याकुल, लक्ष्मण आकुल देखे राह तिहारी
जब तक था कर्तव्य प्रमुख तब तक तो पीड़ा मौन रही
विरह व्यथित अंतर रे, अंतर से अंतर की बात कही
अब तो प्रतीक्षा का एक एक पल पर्वत से भी भारी
काहे विलंब करो आवन मे