ज़िंदगी का पहला दिन
सफर कठिन
दिल में वो आस थी
सोचा कुछ बनने का ज़िंदगी तरसदी
उजाला था हर तरफ़
पर ज़िंदगी मैंने अंधेरे में काट दी
ज़िंदगी छोटी इतनी कि
ज़िंदगी मेने एक टेप से नाप दी
ज़िंदगी अधूरी
ज़िंदगी बिन अधूरा मैं
सपने मेरे फिर भी कर ना सकता पूरा मैं
बैठा हूँ ज़मीन पे
तारे भी दिखते छोटे
कल का हु सवेरा
पर ज़िंदगी में अंधेरा है
हर तरफ़ दिखती खाई दिखता कुआ
मंज़िल नहीं है बढ़ते चल अबे रुकना क्यूं है
दिखे ना कुछ भी
तोलू खुदको किससे
दिखने में सफेद शरीर मेरा धुआ है
मैं ख़ुद से दूर दूरी बढ़ती जा रही है
मैं खुदको खींचू मजबूरियां सता रही है
ना होती हल बस होती है विफल
मेरी कोशिशें भी अब एहसान जता रहीं हैं
जुड़ना ज़मीन से पर जाते जा रा ऊपर
मरना हु चाहता पर तरस खा र रूह पर
रोती है रूह ये कहाँ आके फस गई
लोग चल रहे ज़मीन पे मैं चल रहा आँसू पर
हवा भी कम पड़ रही है मेरे रहने को
कहती मुझसे बस थोड़ी देर और बहने दो
अब मुझे ऐसा लग रहा हवा आँसू है
ना दिखते है अपनों को ना दिखते है गैरों को
मैं परिंदा सा बन उड़ र हु
हल्का मेरा शरीर अब हवा से जुड़ रहा हू
धीरे धीरे लग रहा है सब कुछ यही था
ज़िंदगी में फेला भोत अब कुछ गज में सिकुड़ रहा हु