मुसाफ़िर दिल का न यहाँ कोई बसेरा
ये दिल ही तो अपने सुकून का लुटेरा
मिले जो कहीं मुझ को नूर-ए-ख़ुदा
मिटा दूँ मैं अपनी ख़ुदी का अँधेरा
सूफ़िया
सूफ़िया
सूफ़िया ओ सूफ़िया
कोई दे मुझे भी अपनी सूफ़ी अदा
के जैसे तेरे पास बैठा
मेरे भी पास आ के बैठे ख़ुदा
सूफ़िया
ओ सूफ़िया
कोई दे मुझे भी अपनी सूफ़ी अदा
के जैसे तेरे पास बैठा
मेरे भी पास आ के बैठे ख़ुदा
उल्फ़त की ऐसी तू सिखा दे अदा
याद रहे ना मुझे
किसी की ख़ता
जग में कोई बैरी
न बेगाना दिखे
ऐसी नज़र मुझे कर दे अता
दामन मेरे को तू
कर दे सूफ़ियाना
दिल को बना दे मेरे रब का आशियाना
टूट न पाए मेरा ईमान कभी
चाहे जग सारा ही हो जाए काफ़िराना
ऐसा कोई नग़मा दे
लबों पे आए मेरे बन के दुआ
सूफ़िया
ओ सूफ़िया
कोई दे मुझे भी अपनी सूफ़ी अदा
के जैसे तेरे पास बैठा
मेरे भी पास आ के बैठे ख़ुदा
मंज़िल ना आए कोई
कैसा ये सफ़र
ख़्वाहिशों की इतनी क्यों लंबी है डगर
पल दो पल ही यहाँ ठहरे ख़ुशी
ख़ुशियों की इतनी क्यों छोटी उमर
के मन को चैन मिले
ऐसा पोशीदा कोई राज़ बता
सूफ़िया
ओ सूफ़िया
मुझे भी दे दे ऐसी सूफ़ी अदा
के जैसा तेरे पास बैठा
मेरे भी पास आ के बैठे ख़ुदा
जब प्रेम की अगन लग्न लगा बैठे गा
तू मन के ऐब जला बैठे गा
जैसे मूसा संग खुदा बैठा
वो तेरे पास भी आ बैठा गा
वो तेरे पास भी आ बैठा गा