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रुक गये फिर मेरे
क़दम इस सोच में
पीछे जौ चोर आया हूँ
वो भी थाई मेरे
निकले जो इस हवस में
यह कह पाएँ गई
सब कुछ लुटाए
जो अपने थाई मेरे रुक गये
शरीक-ए-घाम भी है मेरा
और तुम भी मेरे
साथ क्यूँ फिर ना चले थाई
तुम फिर मेरे
निकले जौ इस हवस में
यह कह पाएँ गई
फासला तोड़ा और मंज़िल आगे मेरे
अंधेरा बन कई
उफ़ाक़ कई उजालों में
ज़मीन की थकान को
क्यूँ इस तरह छुपाऊँ में
इक साया आ गया है
इक साया रुक गया है
इक साया अपने
साथ लाई कर मुझे
चल परा है
अंधेरा बन कई
उफ़ाक़ कई उजालों में
ज़मीन की थकान को
क्यूँ इस तरह छुपाऊँ में