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इन कागजी टुकड़ो के पीछे हर शै मख़लूक़ को बरबाद किया
ऊँचाईयो कि चाहत में मैंने कुछ सही कुछ गलतियों को अंजाम दिया
कुछ कर गुजर जाने के लिए खुद को ही खुद से बदनाम किया
अपनी ख़ुशी के खातिर कितनी खुशियों को बेबाक किया
ज़िंदगी का ये माजरा क्या है?
बंदगी का ये सिलसिला क्या है?
ज़िंदगी का ये माजरा क्या है?
इन्सान है हम इन्सान थे वह भी जिनके अश्कों को बहने दिया
क्यों शोर बरपाया है सुकून में कैसा ये तुमने माहौल किया
ये गंगा तीरथ क्या है जब मैले से मन को ना साफ़ किया
झूठी तौबा से अच्छा काफ़िर है जिसने कुफ्र कहा
ज़िंदगी का ये माजरा क्या है?
बंदगी का ये सिलसिला क्या है?
ज़िंदगी का ये माजरा क्या है?
बंदगी का ये सिलसिला क्या है?
कोई तो मिले, इतना बता दे मुझको
कोई तो सही रस्ता दिखा दे
अरसा हुआ भटके हुए है मुझको
इस राह पे लौ कोई जलादे
ज़िंदगी का ये माजरा क्या है?
बंदगी का ये सिलसिला क्या है?
ज़िंदगी का ये माजरा क्या है?
बंदगी का ये सिलसिला क्या है?