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लोग कहते काफ़ी, आज कर, कल ही मिलेगा
तू आज ले ज़ख्म, ये कल तेरा मरहम बनेगा
ये ले, पहन पोशाक झूठ की, तभी जमेगा
ये सोचें पीछे पीठ के, ये साला कब मरेगा
मैं देखूँ पहने झूठ के मुखौटे अपनों को ही
मैं दिल दुखाता, अक्सर चुभता दिल में अपनों के ही
मैं अक्सर सोच करके तोड़ देता सपनों को ही
ना समझे कितना बदला मैं खातिर अपनों के ही
ना लिखता ख़ास इतना, लिखता जो भी दिल में मेरे
मैं रहता शांत, पर ये शोर क्यों है दिल में मेरे
है क्यों नाराज़गी यूँ बेपनाह इस दिल में मेरे
मैं देखूँ हर घड़ी, हर वक़्त कैसे बदले चेहरे
क्यों ना है भरोसा मुझपे मेरे अपनों को
वो सब ये बोलें कि तू ना समझता अपनों को
है मुझमें ईगो या घमंड लगे ये अपनों को
मैं गिर चुका हूँ शायद नज़रों में ही अपनों के
मैंने ज़िंदगी को देखा इतने पास से
मुझको ना बची है आस अपने ख़ास से
मुझको है पता ये मुश्किल काफ़ी रास्ते
मैं रास्तों को काट डालूँ, क़लम मेरे पास है
मैंने ज़िंदगी को देखा इतने पास से
मुझको ना बची है आस अपने ख़ास से
मुझको है पता ये मुश्किल काफ़ी रास्ते
मैं रास्तों को काट डालूँ, क़लम मेरे पास है
मैंने जितने गुनाह देखे
वो मुझसे निकले मेरी पन्ना लेकर
और कितनों को बोलूँ मैं
सब चाहे मिट जाऊँ मैं, ये कला लेकर
मैंने जितने गुनाह देखे
वो मुझसे निकले मेरी पन्ना लेकर
और कितनों को बोलूँ मैं
सब चाहे मिट जाऊँ मैं, ये कला लेकर
मेरी बातें सरफ़रोश होती मुझमें ही
मैं चुपचाप हूँ खड़ा, क्यों खलती ना मेरी कमी
है आँख भी ये नम, ये बातें दिल को हैं चुभीं
वो देखो हँस रहे हैं सारे, रूह ये देख रही
मुझको है पता ये अपने कौन ख़ास मेरे
मुझको ही दिखे ये साज़िशों के जाल कैसे
मुझको है पता ये दूर कितने पास मेरे
सब ये सामने खड़े हैं, फिर भी कहते ख़ास मेरे
मैंने अपनों को देखा है
हर ज़ख्मों को देखा है
मैंने खुद की तबाही के
मंजर पर बैठ के ज़ख्मों को सेका है
मैंने ख्वाहिश के सजदे में
हर मन्नत को देखा है
पर बदलेगा पल ये, ना रहता एक जैसा
ये उसी का लेखा है
मैंने जितने गुनाह देखे
वो मुझसे निकले मेरी पन्ना लेकर
और कितनों को बोलूँ मैं
सब चाहे मिट जाऊँ मैं, ये कला लेकर
मैंने जितने गुनाह देखे
वो मुझसे निकले मेरी पन्ना लेकर
और कितनों को बोलूँ मैं
सब चाहे मिट जाऊँ मैं, ये कला लेकर