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Farooq
चढ़ी मुझे यारी तेरी ऐसी, जैसे दारू देसी
खट्टी-मीठी बातें हैं नशे सी, जैसे दारू देसी
चढ़ी मुझे यारी तेरी ऐसी, जैसे दारू देसी
खट्टी-मीठी बातें हैं नशे सी, जैसे दारू देसी
लड़खड़ाने लगी, मुस्कुराने लगी
बेवजह हर जगह आने-जाने लगी
तू मुझे, मैं तुझे
जो भी हो दिल में, वो खुल के बताने लगी
Farooq