भट्टी में तपा हूँ साहब,
आग से मैं नहीं डरता।
लेकिन बेवजह में,
आग से खेला नहीं करता॥
पत्थर का दिल है मेरा,
मैं रोया नहीं करता।
दूसरों के दर्द पर,
बेवजह में मुस्कुराता भी नहीं॥
वफ़ादार हूँ मैं,
धोखा आज तक दिया नहीं।
साबित करने वफ़ादारी,
बार बार मैं मालिक बदलता भी नहीं॥
ग़ुलाम नहीं वफ़ादार हूँ,
सोचकर बोलना मेरे लिए।
कमज़ोरों की तरह,
ग़ुलामी मुझको आती नहीं॥
दिमाग नहीं,
दिल से फैसला लिया है आज तक।
बेवजह प्यादो की,
बैसाख से मैं खेलता नहीं॥
देखो मालिक,
साथ अपना तरक्की तक,
और जब तक आप मुझे भूलते नहीं।
भूल गए तो भी,
घंटा फर्क मुझको पड़ता नहीं॥
क्योंकि साहब,
हम भी किसी के,
मालिक होंगे एक दिन
और हमारा भी होगा कोई वफ़ादार॥
क्योंकि साहब,
हम भी किसी के,
मालिक होंगे एक दिन
और हमारा भी होगा कोई वफ़ादार॥