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ज़िंदगी ज़िंदगी
क्या कमी रह गई
आँख की कोर में
आँख की कोर में
क्यूँ नमी रह गई
ज़िंदगी ज़िंदगी
क्या कमी रह गई
आँख की कोर में
क्यूँ नमी रह गई
तू कहाँ खो गई
तू कहाँ खो गई
कोई आया नहीं
दोपहर हो गई
कोई आया नहीं
ज़िंदगी ज़िंदगी
दिन आए दिन जाए
सदियाँ भी गिन आए
सदियाँ रे
तन्हाई लिपटी है
लिपटी है साँसों की
रसिया रे
तेरे बिना बड़ी प्यासि है
तेरे बिना है प्यासि रे
नैनों की दो सखियाँ रे
तन्हा रे मैं तन्हा रे
ज़िंदगी ज़िंदगी
क्या कमी रह गई
आँख की कोर में
क्यूँ नमी रह गई
ज़िंदगी ज़िंदगी
सुबह का ख्वाबरा है
शाम की धूल है
तन्हाई है
रात भी ज़र्द है
दर्द ही दर्द है
रसवाई है
कैसे कटे साँसें उलझी हैं
रातें बड़ी झुलसी-झुलसी हैं
नैना कोरी सदियाँ रे
तन्हा रे मैं तन्हा रे
ज़िंदगी ज़िंदगी
क्या कमी रह गई
आँख की कोर में
क्यूँ नमी रह गई
ज़िंदगी ज़िंदगी
क्या कमी रह गई
आँख की कोर में
क्यूँ नमी रह गई
तू कहाँ खो गई
कोई आया नहीं
दोपहर हो गई
कोई आया नहीं
ज़िंदगी ज़िंदगी
क्या कमी रह गई
आँख की कोर में
क्यूँ नमी रह गई