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रोशनी न पड़ती एक-सी हर जगह है
ये तो न है कि सूरज बदल गया है
फिर भी क्यों दिल ये मेरा गरज रहा है?
मेरी मंज़िल जहाँ
निकल तो रहा हूँ घर से, पर दिल जुड़े जो
खुशियों के रंग में जैसे आँसू घुले हो
बारिश आने से पहले ही हैं छुपे जो
वो मैं था यहाँ
पूछूँ मैं खुद से
कि क्या फ़ासले?
और क्या ही ये दूरियाँ?
जब इतने हो दिल जुड़े
तो टूटे न दूरियां
तो क्यों हूँ मैं डरा?
परा-परा
यूँ ही बेवजह
परा-परा
अंडे से निकली चिड़िया है तो उड़ना भी वो सीखेगी ही
कोई घर से निकला है तो किसी पे तो बीतेगी ही
दूर रहने को है दूरियाँ किसने कहा?
कहा-कहा
बचपन तो लगे ठीक ही पर बढ़ने में है अपना नशा
दादी और नानी के घर से निकल के ही पता चला
जहाँ तक मेरी नज़रें जाएँ
ये गोला है उतना बड़ा
बस एक ही डर है
कि मैं न रह जाऊँ अकेला साथ चलने के बाद भी
सालों की ये दोस्तियाँ भुला दें न कुछ साल ही
अगर नहीं पता मुझे कि क्या हुआ है हाल ही में
तो तुम सब बताओगे न?
उम्मीद है कि रिश्ते ये अंधेरों में मशाल से
न छोड़ा था न छोड़ना मुझे तुम मेरे हाल पर
तुम्हें तो पता ही है क्या चलता इस दिमाग़ में
तो बात करते रहना
क्या फ़ासले?
और क्या ही ये दूरियाँ?
जब इतने हो दिल जुड़े
तो टूटे न डोरियाँ
तो क्यों हूँ मैं डरा?
परा-परा
यूँ ही बेवजह
परा-परा
पंख तो फैले हैं कब से ही मेरे, अब मुझे तू उड़ने दे
आँखें ये मेरी हैं, देखे जो सपने, लोग उनसे मिलते रहें
अब पूछ न मुझसे कि है
कि है
क्या ये रास्ते?
क्या फ़ासले? (अब क्या ये फ़ासले?)
और क्या ही ये दूरियाँ? (क्या ये दूरियाँ?)
जब इतने हैं दिल जुड़े (दिल जुड़े हैं मुझसे)
तो टूटे न डोरियाँ
तो क्यों हूँ मैं डरा?
यूँ ही बेवजह?