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उड़ती बूँदों का एक क़तरा, बेख़बर सा बिखरा बिखरा
एक सीपी में जा के उतरा, हालातों ने कुछ यूँ तराशा
देख मासूम सी ये हलचल, हर कोई हो रहा है क़ायल
आँखें मूंदे चले हैं बेक़रार, एक कशिश सी खींचे उसी ओर
जुड़ रही भीड़ सी, उसको क्या, इसको क्या, किसको क्या
जुड़ रही भीड़ सी, खोए खोए से हैं सब यहाँ
चेहरे जाने से, थोड़े अनजाने से
आँखों से, बातों से कर दे गुमान
रास्ते पुराने से, खो गए ज़माने से
मिल गए, जुड़ गए, बन गया निशान
खिल रही धूप सी, चढ़ रही है
बढ़ रही, भोली सी दास्तान
बढ़ गया साँसों में, जागता पैरों के आसमाँ
उड़ रही धूल सी, आँख खोले सोए सब यहाँ
उड़ रही भीड़ सी, इसको क्या, उसको क्या पता