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बावरा मन व्याकुल राह ओझल
बावरा मन व्याकुल राह ओझल
काल की धूल जमीं कागज़ पे
काल की धूल जमीं कागज़ पे
शून्य सा जो चलता जाए
सूर्य वहीं लेकर आए
सत्य तभी तो रौशन होगा
पलकों पे ठहरा जो एक सपना
सिरहाने अंबर के मुखतृष्णा
भटके हुए अतीत के किस्से
किरदारों को पाना है
पार क्षितिज के जाना है
पूरण होगी तब ये तपस्या
बावरा मन व्याकुल राह ओझल
बावरा मन व्याकुल राह ओझल
बिखरे हुए कुछ पन्ने कुछ इतिहास का फेरा
सच कब तक हारेगा पास कमल में डेरा
मानव तप से उतरे गंगा बनके जोगी नाच मलंगा
लक्ष्य को अब तो पाना है पार क्षितिज के जाना है
पूरण होगी तब ये तपस्या
पलकों पे ठहरा जो एक सपना सिरहाने अंबर के मुखतृष्णा