कोई सबब ज़रूर था...
कोई सबब ज़रूर था, तुम जो ख़फ़ा हुए
कोई सबब ज़रूर था, तुम जो ख़फ़ा हुए
अपनी ख़ुशी से हम भी कहाँ बेवफ़ा हुए
कोई सबब ज़रूर था, तुम जो ख़फ़ा हुए
अपनी ख़ुशी से हम भी कहाँ बेवफ़ा हुए
कोई सबब ज़रूर था...
आज़ादियाँ तुम्हें तो मयस्सर है रात-दिन
हो-हो-हो, आज़ादियाँ तुम्हें तो मयस्सर है रात-दिन
आज़ादियाँ तुम्हें तो मयस्सर है रात-दिन
लेकिन तुम्हारी ज़ुल्फ़ से हम कब रिहा हुए
अपनी ख़ुशी से हम भी कहाँ बेवफ़ा हुए
कोई सबब ज़रूर था...
रुख़्सत की रस्म ख़ूब निभाई है तुमने, यार
रुख़्सत की रस्म ख़ूब निभाई है तुमने, यार
रुख़्सत की रस्म ख़ूब निभाई है तुमने, यार
होकर जुदा, जुदा ना हुए, यूँ जुदा हुए
अपनी ख़ुशी से हम भी कहाँ बेवफ़ा हुए
कोई सबब ज़रूर था...
आते हैं याद हमको जवानी के रोज़-ओ-शब
आ-आ-आ, आते हैं याद हमको जवानी के रोज़-ओ-शब
आते हैं याद हमको जवानी के रोज़-ओ-शब
चुटकी बजाई वक़्त ने, लम्हे हवा हुए
अपनी ख़ुशी से हम भी कहाँ बेवफ़ा हुए
कोई सबब ज़रूर था...
कोई सबब ज़रूर था...
कोई सबब ज़रूर था...