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रुनझुन बाजे पैंजनियाँ रे
अरे डोलन लगा जहाँ
पीते पीते भगत के
चले सवयं भगवान
कौन मिले पर्वत नदिया राह दे
ये पर्वत नदिया राह दे
और चंदन बनती धूल
जहाँ जहाँ प्रभु पग धरे
काँटे बन गए फूल
ना कोई वृक्ष है दूर दूर तक
ना कोई ठंडी आहें
हरे राधे गोपाल को
चलते नंगे पांव