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Sencillo / Pista
चाहा जब भी कुछ, कुछ और ही मिला
होता है ये क्यूँ हर दफ़ा?
ज़िंदगी की चाय में biscuit गिरा
वो भी है क्या मुझसे ख़फ़ा?
मेरे हाथों की इन लकीरों में
शायद ऐसा ही लिखा
ख़ुशियों का था एक लिफ़ाफ़ा मेरा
दराज़ में ही बंद रह गया
कुछ ही यार थे, वो भी चल पड़े
अपनी क़िस्मतों की राह पे
मेरे हाथों की इन लकीरों में
क्यूँ ना कुछ और है लिखा?
नसीब में मेरे खोटे सिक्के ही रहे
उम्मीद रख के क्या फ़ायदा
कल मिली थी बिल्ली सड़क पे मुझे
हड़बड़ा के वो भी मुड़ गई
सोचती है क्या, मुझको है पता
कट ना जाए उसका रास्ता
मेरे हाथों की इन लकीरों में
कुछ अजीब-सा ही लिखा
है ज़रा मगर जो भी है मिला
ले लूँ उसमें जीने का मज़ा
जीने का मज़ा
जीने का मज़ा