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मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सु दशरथ अजर बिहारी
मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सु दशरथ अजर बिहारी
मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सु दशरथ अजर बिहारी
हुआ था वार जब था धर्म पे
करने को आए विश्व कल्याण विश्वामित्र मुनि
लेने विश्वामित्रप्रिय
दिया सारा चित्र विश्व धीर दशरथ महाराज को
कैसे एक ताड़का ने डोला ब्रह्मांड का
एक कोना दिया मार हर सहारा था लाचार
हुआ यज्ञ का विचार कैसे किया हस्तक्षेप
लेके अस्थियां की भंग कर न पाए कुछ प्रमाद वो
मांगा था राम को महाराज परेशान वो
जो दिल का एक अंश जाए दूर संसार हो
श्राप के भय विश्व मुनि आग्रह से
उनकी रक्षा करने हेतु दिए उनको भाई दो
राम की बाल अवस्था में जो तेज
होके भयमुक्त मुनि को दिलाया विश्वास
मारी ताड़का उन्होंने ये तुंदीर के एक तीर से
और किया यज्ञ पूर्ण किया कृपा का प्रकाश
सीताराम चरित अति
पावन मधुर सरस हरु अति मन भावन
सीताराम चरित
अति पावन मधुर सरस अति मन भावन
सीताराम राम राम राम राम राम राम राम सीता
राम राम राम राम राम राम राम
लेके उस वीर को पहचाना न संसार वो
मिथिला नरेश की संतान मिली राम को
जब देखा सीता माता को जो हारे सारे चैन
दोनों नयनों में देखे पर हटा न पाए ध्यान वो
भरी सभा में आए योद्धा महावीर
कोई हलाती खराब, किसी में नहीं धीर
तब लक्ष्मण के क्रोध ने सभा को दिया ज्ञान
करा राम गुणगान, राम ही धर्म वीर
राम के बिना न धरती पे कोई न चलता
राम का ही आसरा लेके जीवन है पलता
राम के ही आगे मृत्यु की न औकात
हैं जो राम महाबाहु, प्रणाम करे वीर भी
उसी राम ने जो देखने में कोमल सी संतान
प्रणाम किया धनुष, शिव का लिया आशीर्वाद
रफ्तार से उठाया, प्रतिंचा चढ़ाया, तोड़ा
सीता राम जी की जय जय, सीता ने पाया राम
सीताराम चरित अति
पावन मधुर सरस हरु अति मन भावन