(तो हूँ झूमती-फिरती, मैं बहती रहूँ)
बावरे, दिन ढले, घर से जो चल पड़े
खो गए रास्ते
बावरे, दिन ढले, घर से जो चल पड़े
खो गए रास्ते
पंछी सा उड़ता जो चला
मैं ढूँढता फिरूँ, ना जाने मंज़िल है कहाँ
नाराज़गी है इन हवाओं में
बाँहों में ले लूँ मैं इन्हें
क़दम बहके-बहके जो थे
वो हैं सँभले-सँभले हुए
है रोशनी दिल में जगी सँभाले मुझे
मिल जाए जो कोई हमसफ़र
फ़ासलों में खोए हुए पर
ख़ुद से हुई जो आशिक़ी
तो हूँ झूमता-फिरता, मैं बहता रहूँ
बावरे, दिन ढले, घर से जो चल पड़े
खो गए रास्ते
भूली हूँ, जानूँ ना कहाँ पे
आता ना मुझको याद है
अब से सुनूँगी दिल की बातें
दिल बे-फ़िकर, आज़ाद है
सुबह आए लेके रातें रोशनी
हैं रातें सारी जुगनू से भरी
ना जाने मंज़िल है कहाँ
बता दे मुझे
मिल जाए जो कोई हमसफ़र
तो बाँट लूँ ये मेरा सफ़र
ख़ुद से हुई जो आशिक़ी
तो हूँ झूमती-फिरती, मैं बहती रहूँ
बावरे, दिन ढले, घर से जो चल पड़े
खो गए रास्ते
बावरे, दिन ढले, घर से जो चल पड़े
खो गए रास्ते