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अंधेरों में रहूँ
कुछ दिखता ही नहीं
है हाथों में कलम
पर लिखता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
अंधेरों में रहूँ
कुछ दिखता ही नहीं
है हाथों में कलम
पर लिखता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
तारेकी में मशाल की तरह हो तुम
अर्से बाद आये ख़याल की तरह हो तुम
पर देखो जानम आज फिर तुम आयी नहीं
तो क्या मेरे ज़वाल की तरह हो तुम?
करती हो मुझे कैसे लाजवाब तुम?
पूछे गए एक सवाल की तरह हो तुम
मुड़के सामने तुम आ ही जाती हो ना फिर
जान-ए-मन्न मेरे आमाल की तरह हो तुम
फिर कैसे तुमसे दूर रहें?
हम भी कितने मजबूर रहें?
होश क्या?
नशे में चूर रहें
आजकल बातें बड़ी बड़ी भूल रहें
आजकल आते ही नहीं घर
आजकल रातें मेरी ब्लर
आजकल बुरा है हशर
आजकल चाहिए बस सबर
आजकल याद आये तेरी तो मैं पी लेता हूँ तब
अब एवरी अदर डे I’m faded
लगता ही नहीं I’ve made it
लगता है मुझे ये आदतें ही मार देंगी
मेरी ख्वाहिशें क्या कभी मेरा साथ देंगी?
परिंदों का तो शजर ही ठिकाना है
मुझे अपना ज़ाती घर बनाना है
मेरे ख्वाब सिर्फ ख्वाब तो नहीं
हालात से खाई कभी मात तो नहीं
हद-ए-आख़िर फिर मैं कैसे कर दूं जाहिर?
मेरे पास मेहनत का हिसाब ही नहीं
मेरे पास सवालों का जवाब नहीं
ना ही ना कर सकूँ, ना ही करूँ हाँ कभी
तू आ भी जाये शायद के तू आ भी नहीं
मुझे बस शक है, भरोसा तो नहीं
मैं तेरा सच हूँ, मुझे झुटला तो नहीं
मैं समझ सकता हूँ
मुझे समझा तो सही
अंधेरों में रहूँ
कुछ दिखता ही नहीं
है हाथों में कलम
पर लिखता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
अंधेरों में रहूँ
कुछ दिखता ही नहीं
है हाथों में कलम
पर लिखता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं
ग़म मिटता ही नहीं