क़िस्मत तो देखो, हमसफ़र
क़िस्मत तो देखो, हमसफ़र
चार क़दम चले नहीं
चार क़दम चले नहीं
इस तरह जुदा हुए
कि आज तक मिले नहीं
आज तक मिले नहीं
क़िस्मत तो देखो...
दिल ने तो की दुआ बहुत
लेकिन ना आ सकी बहार
फूल उम्मीदों के मेरे
खिलाए भी खिले नहीं
खिलाए भी खिले नहीं
क़िस्मत तो देखो...
दिल ने तो चाहा था कि अब
कह दें अपना माजरा
उल्फ़त ने सी दिए ऐसे लब
हिलाए भी हिले नहीं
हिलाए भी हिले नहीं
क़िस्मत तो देखो...
रौशन थी जिनसे ये ज़मीं
रौशन था जिनसे आसमाँ
यूँ गुल हुए मेरे चराग़
जलाए भी जले नहीं
जलाए भी जले नहीं
क़िस्मत तो देखो, हमसफ़र
चार क़दम चले नहीं
इस तरह जुदा हुए
कि आज तलक मिले नहीं
क़िस्मत तो देखो...