आ
दुर मंजिल है राह गुजर तन्हा
रास्ता ख़त्म ही नहीं होता...
रेजा रेजा है ख्वाब आंखों में
कैसे कह दो के गम नहीं होता...
कोई शिकवा नहीं मगर मौला
कोई शिकवा नहीं मगर मौला...
क्या करूं, दर्द कम नहीं होता
जिंदगी के उदास लम्हों में
तेरी यादों का सायेबां तो है...
तेरा एहसास तेरी खुशबू है
मेरे अपनों का एक मन तो है...
ये चिरागों को क्या बुझायेंगी
के हवाओं में दम नहीं होता...
कोई शिकवा नहीं मगर मौला
कोई शिकवा नहीं मगर मौला...
क्या करूं, दर्द कम नहीं होता
क्या कहें किस तरह गुजारी है
जिंदगी तुझको जी की देख लिया...
मेरे ज़ख्मों की बात करते हो
ये ज़हर हमने पीके देख लिया...
क्या किसी से गिला करे कोई
तू बी-मयल करम नहीं होता...
कोई शिकवा नहीं मगर मौला
कोई शिकवा नहीं मगर मौला...
क्या करूं, दर्द कम नहीं होता.