जो बाहर से गीला
तन मन से सूखा..."
(Repeat softly)
"शहरी बाबू वह... रेनकोट हो गया..."
छोड़ी मैंने सब आशा
इस मुश्किल भरी भारी बारिश में
सूरज की किरणें
यह साला बादल चुरा गया
जो बाहर से गीला
तन मन से सूखा
शहरी बाबू वह
रेनकोट हो गया।।
हर बूँद एक सवाल है
उसके जवाब गिरे
रास्ते नालों और गड्ढों में
ढूँढने बैठा में तो साला
मुझपर किचड़ उछल गया।।
जो बाहर से गीला
तन मन से सूखा
शहरी बाबू वह
रेनकोट हो गया।।
थोड़ा डरता थोड़ा लड़ता
थोड़ा फैला थोड़ा मैला
आधा सूखा थोड़ा गीला
चाचू मेरा वो छाता हो गया।।
और भी मामू है इस दुनिया में
जो पूरा के पूरा सूखा हमेशा
कार में बैठा जहाज से लौटा
ना जाने वो? ना माने वो ?
की वक्त नहीं रहेगा एक जैसा
भेजा चलता नहीं है उसका
जब से देख रहा है वह पैसा ही पैसा।।
जो बाहर से गीला
तन मन से सूखा
शहरी बाबू वह
रेनकोट हो गया।।
पर देखो इस ग़रीब को
देखो इस शरीफ को
यह ना पहने रेनकोट
दिल में इसके ना कोई खोट
यह ना खोल पाया छाता
ढक सका ना कभी माथा
किसी गड्डी में न बैठ पाया
कपड़ा भी न पहन पाया
वह गरीब गांडू
आँखों से गीला और
पेट से भूखा सो गया।।
पेट की भूख मिटाने
दुनिया से लड़ने के लिये
बुरो से भिड़ने के लिए
कब सूरज जन्मेगा ?
कब ज्वालाओं का सागर खौलेगा?
कब बूँदों के जवाब किरणें देंगी ?
कब मन अंगारों से
तन ज्वालाओं से गीला होगा ?
गरीबी के संकटों से ज़्यादा
हौसलों का ज़ोर होगा।।
जो बाहर से गीला
तन मन से सूखा
बाबू शहरी वह
रेनकोट हो गया।।
बारिश में खड़े
यह सोचते सोचते
मैं संकटों का डर भूल गया।
गीला होते होते
मुझ पर से रेनकोट उतर गया
जो बाहर से गीला
तन मन से सूखा
शहरी बाबू वह
रेनकोट हो गया।।