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रसिकहो आता जे पद आपण ऐकणार आहोत
त्यातली विरहोतकटिता
झुरणारी विरहिणी
आपल्या मनाचा कसा ठाव घेते बघा
चंद्राची कोवळी किरणे
ह्या विरहिणीला स्पर्श करतायत
आणि प्रियकराच्या विरहाने
ती अधिकच तळमळून उठतेय आणि म्हणतेय
आ आ आ आ आ आ
विकल मन आज झुरत असहाय
विकल मन आज झुरत असहाय
विकल मन आज झुरत असहाय
विकल मन आज
विकल मन आज झुरत असहाय
नाहि मज चैन क्षण क्षण झुरति नयन
कोणा सांगू
विकल मन आज झुरत असहाय
ही चांदरात नीज नच त्यात
ही चांदरात नीज नच त्यात
विरह सखि मी कुठवर साहू
विरह सखि मी कुठवर साहू
नाहि मज चैन क्षण क्षण झुरति नयन
कोणा सांगू
विकल मन आज झुरत असहाय
विकल मन आज झुरत असहाय
विकल मन आज
विकल मन आज झुरत असहाय
आ आ आ आ आ आ
विकल मन आज
विकल मन आज झुरत असहाय
झुरत असहाय
झुरत असहाय
विकल मन आज आ आ आ
विकल मन आज झुरत असहाय
झुरत असहाय आ आ आ आ आ
विकल मन आज झुरत असहाय
विकल मन आज
विकल मन आ आ आज
आ आ आ आ आ
विकल मन आज झुरत असहाय
आ आ आ आ आ
झुरत असहाय झुरत असहाय
विकल मन आ आ आज
झुरत असहाय
विकल मन आज झुरत असहाय
ही चांदरात नीज नच त्यात
ही चांदरात
चांदरात
ही चांदरात
ही चांदरात
चांदरात
ही चांदरात नीज नच त्यात
ही चांदरात
चांदरात
चांदरात
ही चांदरात
ही चांदरात नीज नच त्यात
ही चांदरात नीज नच त्यात
विरह सखि मी कुठवर साहू
विरह सखि मी कुठवर साहू
विरह सखि मी कुठवर साहू
विरह सखि मी कुठवर साहू
नाहि मज चैन क्षण क्षण झुरति नयन
कोणा सांगू
विकल मन आज झुरत असहाय
आ आ आ