(शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं)
(ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्)
(रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं)
(वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्)
(नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये)
(सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा)
(भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे)
(कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च)
(अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं)
(दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्)
(सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं)
(रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि)
जामवंत के बचन सुहाए
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई
सहि दु:ख कंद मूल फल खाई
जब लगि आवौं सीतहि देखी
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर
बार-बार रघुबीर सँभारी
तरकेउ पवनतनय बल भारी
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता
चलेउ सो गा पाताल तुरंता
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना
एही भाँति चलेउ हनुमाना
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी
तैं मैनाक होहि श्रम हारी
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम
जात पवनसुत देवन्ह देखा
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा
सुनत बचन कह पवनकुमारा
राम काजु करि फिरि मैं आवौं
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं
तब तव बदन पैठिहउँ आई
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा
तासु दून कपि रूप देखावा
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा
मागा बिदा ताहि सिरु नावा
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई
करि माया नभु के खग गहई
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई
एहि बिधि सदा गगनचर खाई
सोइ छल हनूमान् कहँ कीन्हा
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा
ताहि मारि मारुतसुत बीरा
बारिधि पार गयउ मतिधीरा
तहाँ जाइ देखी बन सोभा
गुंजत चंचरीक मधु लोभा
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
नाना तरु फल फूल सुहाए
खग मृग बृंद देखि मन भाए
सैल बिसाल देखि एक आगें
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें
उमा न कछु कपि कै अधिकाई
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी
अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा
कनक कोट कर परम प्रकासा
कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार
मसक समान रूप कपि धरी
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी
नाम लंकिनी एक निसिचरी
सो कह चलेसि मोहि निंदरी
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा
मोर अहार जहाँ लगि चोरा
मुठिका एक महा कपि हनी
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी
पुनि संभारि उठी सो लंका
जोरि पानि कर बिनय ससंका
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा
चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
बिकल होसि तैं कपि कें मारे
तब जानेसु निसिचर संघारे
तात मोर अति पुन्य बहूता
देखेउँ नयन राम कर दूता
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा
हृदय राखि कोसलपुर राजा
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई
गोपद सिंधु अनल सितलाई
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही
राम कृपा करि चितवा जाही
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना
पैठा नगर सुमिरि भगवाना
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा
गयउ दसानन मंदिर माहीं
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
सयन किएँ देखा कपि तेही
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही
भवन एक पुनि दीख सुहावा
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई
लंका निसिचर निकर निवासा
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा
मन महुँ तरक करैं कपि लागा
तेहीं समय बिभीषनु जागा
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा
एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी
साधु ते होइ न कारज हानी
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई
मोरें हृदय प्रीति अति होई
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी
आयहु मोहि करन बड़भागी
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा
तामस तनु कछु साधन नाहीं
प्रीत न पद सरोज मन माहीं
अब मोहि भा भरोस हनुमंता
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती
करहिं सदा सेवक पर प्रीति
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
कहहु कवन मैं परम कुलीना
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना
प्रात लेइ जो नाम हमारा
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर
कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा
पुनि सब कथा बिभीषन कही
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता
देखी चहउँ जानकी माता
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई
चलेउ पवन सुत बिदा कराई
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ
बन असोक सीता रह जहवाँ
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा
बैठेहिं बीति जात निसि जामा
कृस तनु सीस जटा एक बेनी
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई
करइ बिचार करौं का भाई
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा
संग नारि बहु किएँ बनावा
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा
साम दान भय भेद देखावा
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी
मंदोदरी आदि सब रानी
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा
एक बार बिलोकु मम ओरा
तृन धरि ओट कहति बैदेही
सुमिरि अवधपति परम सनेही
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा
अस मन समुझु कहति जानकी
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की
सठ सूनें हरि आनेहि मोही
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन
सीता तैं मम कृत अपमाना
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना
नाहिं त सपदि मानु मम बानी
सुमुखि होति न त जीवन हानी
स्याम सरोज दाम सम सुंदर
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा
चंद्रहास हरु मम परितापं
रघुपति बिरह अनल संजातं
सीतल निसित बहसि बर धारा
कह सीता हरु मम दु:ख भारा
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
सुनत बचन पुनि मारन धावा
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई
मास दिवस महुँ कहा न माना
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद
त्रिजटा नाम राच्छसी एका
राम चरन रति निपुन बिबेका
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना
सीतहि सेइ करहु हित अपना
सपनें बानर लंका जारी
जातुधान सेना सब मारी
खर आरूढ़ नगन दससीसा
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई
लंका मनहुँ बिभीषन पाई
नगर फिरी रघुबीर दोहाई
तब प्रभु सीता बोलि पठाई
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
यह सपना मैं कहउँ पुकारी
होइहि सत्य गएँ दिन चारी
तासु बचन सुनि ते सब डरीं
जनकसुता के चरनन्हि परीं
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी
तजौं देह करु बेगि उपाई
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई
आनि काठ रचु चिता बनाई
मातु अनल पुनि देहि लगाई
सत्य करहि मम प्रीति सयानी
सुनै को श्रवन सूल सम बानी
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी
अस कहि सो निज भवन सिधारी
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
(जय सिया-राम, बोलो, जय सिया-राम)
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला
देखिअत प्रगट गगन अंगारा
अवनि न आवत एकउ तारा
पावकमय ससि स्रवत न आगी
मानहुँ मोहि जानि हतभागी
सुनहि बिनय मम बिटप असोक
सत्य नाम करु हरु मम सोका
नूतन किसलय अनल समाना
देहि अगिनि जनि करहि निदाना
देखि परम बिरहाकुल सीता
सो छन कपिहि कलप सम बीता
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ