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बैठी रात रजाई में
मेरे कल का भोर लिये
दो सौ दस की पढाई मैं
ढाई आकर छोड़ दिये
सौ कदम चली थी
दो कदम पे बाकी
मैं सवेरा कैसे लाती, चाँद डूबा ही नहीं
सांसों की शहनाई में
जाने कितने शोर किये (हाए)
पूछे क्यों परछाई से?
सारे रिश्ते तोड़ दिये
जो मैं हिना समझी (हाए)
क्या उन्हें समझाती?
मैं सवेरा कैसे लाती, चाँद डूबा ही नहीं
(चाँद डूबा ही नहीं)
पूछा पता तेरे घर का जो भी मिला, सबसे
यें आवाज़ें लेके तेरा नाम भी ना रुका कोई
सब अँधेरी माटी, ना दिया, ना बाती (हाए)
मैं सवेरा कैसे लाती, चाँद डूबा ही नहीं
(चाँद डूबा ही नहीं)
(डूबा ही नहीं) हाए
(चाँद डूबा ही नहीं) हाए
हाए (चाँद डूबा ही नहीं)
चाँद डूबा ही नहीं