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अब की ये सुबह इस क़दर हुई
शाम की हमें कुछ ख़बर नहीं
शेख का बयाँ इस क़दर हसीं
इल्म की जुबाँ बे-असर हुई
कोई ऐसा जहाँ, जहाँ ना रात हो
बिन बोले बयाँ, बयाँ वो बात हो
'गर मेरी सुनो वो लाज़वाब हो
मेरा जो मकाँ, जो मेरा ख़्वाब हो
तब की ये सुबह इस क़दर हुई
रोज़ की हमें कुछ फ़िकर नहीं
शेख का बयाँ इस क़दर हसीं
बीध की जुबाँ अब असर हुई
कोई ऐसा जहाँ, जहाँ ना रात हो
बिन बोले बयाँ, बयाँ वो बात हो
'गर मेरी सुनो वो लाज़वाब हो
मेरा जो मकाँ, वो मेरा ख़्वाब हो
हो शादमाँ हर मक़ामाल
शाहीन रूह और ज़ुबाँ
हो कारगर और वसी
शोख़-ए-बराँ, मस्त-ए-बराँ