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हो ओ तूने अब तक
जो कुछ पाया
वो तो हो हर घर की छाया
तूने अब तक जो कुछ पाया
ओ ये सच हैं सचें
हो सकता है कभी इनको
मांगने से मिलता नहीं
कोई भी अधिकार किसी को
कोई भी अधिकार किसी को
छीन ले बरकद तू रे अपना हक
अपना सम्हा
धरती गगन समान
चलती है बिद्रोह की आँधी
चलती है बिद्रोह की आँधी