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हम सत्य के वास्ते मशाल फिर उठाएँगे
हम ही इतिहास की मरीचिका मिटाएँगे
लाएँगे निकाल कर, चिन्ह सारे हिन्द के
मान–सम्मान की अलख नई जगाएँगे
जो हैं बंद द्वारे वो खुलने तो दो
हर्षों की बुद्धि सुलझने तो दो
लहरा दो ध्वज आज तुम केसरी
शंखनाद शिव के सनातन कहो
धम धड़क, धम धम, बम जयकार हो
डमरू के अनाहत में हुँकार हो
धम धड़क, धम धम, बम जयकार हो
डमरू के अनाहत में हुँकार हो
व्याकुल है भूमि ये कब से हमारी
चलो आज उसकी करें मन्त्र
चलो खोल दें यमुना तट की बेड़ियाँ
कि होना है शुद्धिकरण अब यहाँ
सारे भरमवा मिट जाने दो
ज्वाला समय की धड़क जाने दो
हिन्दू हो, सर पे रमालो भस्म
शंखनाद शिव के सनातन का हो
धम धड़क, धम धम, बम जयकार हो
डमरू के अनाहत में हुँकार हो
लपट अधर्म, गीत धर्म का प्रवाह करके
होम से तू पवित्र चेतना को धार कर
तक भर गया प्रचंड मौन का घड़ा
घड़–घड़ के फूट और सत्य का निर्वाह
कर्व के क्रोध को धरा पे आज रक्त उतार कर दिखा
तू अपनी गर्जना सिंह सा दहाड़ कर
उमाल आत्मा का ये विचार बन के चल पड़ा तू आज
अपनी वेदना को फेंक दे उखाड़ कर
धम धड़क, धम धम, बम जयकार हो
डमरू के अनाहत में हुँकार हो