तेरे रूप कितने
हसीन ख्वाब है तू
जुड़ता बिखरता सा
इक नाम है तू
मेरे कानों में गूँजती
इक आवाज़ है तू
मेरे दिल में बजता
इक साज़ है तू
तू रु तू तू रु तू तू रु तू तू रु तू तू रु तू
तुझसे बिछड़ने की आदत बुरी है
जो भी हो वजह लेकिन सज़ा तूने दी है
माना मेरी जान गलती भी मुझसे हुई है
वफ़ा भी तो तुझसे ही की है
हाँ आ
अँधेरे मिटाती वो धूप है तू
जिसे सोचूँ ख़यालों में वो रूप है तू
मेरी साँसों में बस तू हर दम महकती
अलग सी है लेकिन कुछ ख़ास है तू
तू रु तू तू रु तू तू रु तू तू रु तू तू रु तू
तुझसे बिछड़ने की आदत बुरी है
जो भी हो वजह लेकिन सज़ा तूने दी है
माना मेरी जान गलती भी मुझसे हुई है
वफ़ा भी तो तुझसे ही की है
बस इतनी सी है इक मेरी इल्तिजा
बस एक दफ़ा मुझको कहीं मिल जा
पहचानूँगा तुझको अँधेरी रातों में भी
इस बार तुझको जाने दूँगा नहीं
तू रु तू तू रु तू तू रु तू तू रु तू तू रु तू
तुझसे बिछड़ने की आदत बुरी है
जो भी हो वजह लेकिन सज़ा तूने दी है
माना मेरी जान गलती भी मुझसे हुई है
वफ़ा भी तो तुझसे ही की है
तुझसे बिछड़ने की आदत गई है
अब तेरी आदत लगी है