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सुन मन-जहाँ प्रेम है, वहीं भक्ति है; जहाँ भक्ति सच्ची हो, वहीं भाव जागता है।
दूज (द्वैत) घटे... तो ईश्वर पास आता है।
भाव बिना भक्ति नहीं, भक्ति बिना न भाव।
दूज न देखे जो सदा, वही सच्चा प्रभाव॥
भाव है भीतर की लौ-भक्ति उसकी लय,
एक बिना दूजा नहीं-दोनो का एक नय।
केवल नियम, केवल जप-भाव बिन सूखा राग,
केवल आँसू, भक्ति बिना-भटके मन का भाग।
पूजा में पुष्प हो मगर-हृदय में प्रेम कहाँ?
नाम जुबाँ पे है मगर-भीतर की नेम कहाँ?
जो देह से दे तो क्या-दिल से दे तो मान,
सच्चे भाव की भक्ति में-खुलता है पहचान।
जो रीत निभाए भी-और रीत में प्रेम हो,
यही संगति भक्ति की-यही भाव का सेतु हो।
भाव से भक्ति, भक्ति से भाव-
एक ही ज्योति, एक प्रवाह।
दूज मिटे तो दीप जले-
मन में वही सच्चा प्रभाव।
दूज क्या? "मैं-तू" का पर्दा, दूरी की दीवार,
अपने-पराये का झूठा फसाना, सूखा व्यापार।
जब 'मैं' ऊँचा, 'तू' नीचा-भक्ति कहाँ टिके?
जहाँ भेद घटा, प्रेम बढ़ा-वहीं प्रभु दीखे।
स्वार्थ का शोरा छँटे-अहं का ताला टूटे,
नेत्र खुले करुणा से-दुख पर दृष्टि छूटे।
जो हर प्राणी में एक ही नूर पहचाने,
उसकी प्रार्थना-सीधी आकाश को जाने।
एक नूर, एक धुन, एक सा एहसास-
दूज घटे तो खुलता आकाश।
नाम जपे पर जीव जले-ये कैसी साधना?
हाथ जुड़े पर मन कटु-ये कैसी आराधना?
ध्यान वही जो दृष्टि बदले-वाणी को शीतल कर दे,
सेवा वही जो अपने हिस्से-दूजे का आँसू हर दे।
रोज़ की थोड़ी नेकी-भाव की खेती सी,
भूखे के संग आधा निवाला-बस यही भक्ति सी।
मंदिर दूर नहीं-मन के भीतर बैठा;
दूज घटा, प्रेम बढ़ा-ईश्वर यहीं ऐठा।
(प्रेम बिना पूजा क्या? पूजा बिना प्रेम क्या?)
(एक धागे के दो सिरा-छूओ तो बने माला।)
कड़वे शब्दों से भक्ति नहीं,
क्रोध से प्रेम की शक्ति नहीं;
जो स्वयं भीतर निर्मल हो-
वही जग में भक्ति रचे सही।
राग-द्वेष के धागे काट-
साँस-साँस में नाम बसा;
दूर नहीं वह सत्य सखा-
दूज घटाते ही वो मिला।
दर्पण जितना साफ हुआ-
उतना चेहरा सच्चा दिखा;
भाव भरे तो भक्ति बही-
भक्ति बही तो भाव खिला।
भाव से भक्ति, भक्ति से भाव-
एक ही ज्योति, एक प्रवाह।
दूज मिटे तो दीप जले-
मन में वही सच्चा प्रभाव।
प्रेम बने पथ-करुणा हो साथ-
यही है सच्चा उपाय।
कहते कबीर-जो भाव में भक्ति और भक्ति में भाव साधे,
जो दूज न देखे-वही प्रभु के रंग में राधे।
मन एक, दृष्टि एक-तभी सच्चा प्रकाश;
यही भक्ति, यही भाव-2।