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आ आ आ
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
जो हम ना मिल सके
क्यों ग़म पिए
जो मौत आएगी तो बन
जाना तुम तारा ओ सनम
रकम यहां सांसों की
नदियों में लाशें भी
क्यों ज़िंदा लोगों को भी
जीने में अब आती है शर्म
रहना तुम
रहना तुम
मैं औरों के पन्नों पे
खुद की स्याही से बेवजह लिखता रहा
सारी उम्र मैं तेरे से दूर रहा
और पैसों में वक्त बिकता रहा
क्यों गवाह दिया तेरा साथ हां
समझौते के रिश्तों में बंध
लिखूं फिरसे वो दास्तां जहां इश्क़
मुसलसल, हिफाज़त में हम दो बदन
इबादत हो जाए, जब लफ्जों नाम तेरा
और नज़्मों में आए जिक्र
क़यामत भी आए, मोहब्बत ये कम ना
पड़े जहां जिस्मों की होगी क़दर
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
जो हम ना मिल सके
क्यों ग़म पिए
जो मौत आएगी तो बन
जाना तुम तारा ओ सनम
रकम यहां सांसों की
नदियों में लाशें भी
क्यों ज़िंदा लोगों को भी
जीने में अब आती है शर्म
दर्द ओ सितम हंस देख रहा हूं
मैं उनकी नादानियां भी गिन रहा हूं
दिलासे वो देते हैं झूठे
मैं उनकी हकीकत को ही पढ़ रहा हूं
तेरे बिना लगता सूना
इक अरसे से मैंने तुझे देखा नहीं
इन धर्मों में रखा कुछ है ना
पैसा शोहरत क़ब्रों में जानी नहीं
धड़कन लगे क्यों परेशान
शहरों में इक ज़लज़ला
मंजिल जो तुझसे मिलाए
उस घर का रास्ता कहां
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
रहना तुम नज़र में
जो हम ना मिल सके
क्यों ग़म पिए
जो मौत आएगी तो बन
जाना तुम तारा ओ सनम
रकम यहां सांसों की
नदियों में लाशें भी
क्यों ज़िंदा लोगों को भी
जीने में अब आती है शर्म