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ज़िंदगी की बाँसुरी पर गीत कैसे गा सकूँगी
ज़िंदगी की बाँसुरी पर गीत कैसे गा सकूँगी
मैं सिसकते इन स्वरों से कैसे मन बहला सकूँगी
ज़िंदगी की बाँसुरी...
देवता तुमको बना कर की समर्पित मैंने पूजा
आज तक आया ना कोई मेरे मन में और दूजा
ये कहाँ मुझको पता था, मैं ना तुमको पा सकूँगी
मैं सिसकते इन स्वरों से कैसे मन बहला सकूँगी
ज़िंदगी की बाँसुरी...
मैं भी हूँ कैसे अभागन, छू सकी ना ये चरण
एक ही मेरे लिए है, अब हो जीवन या मरण
भेद ये कैसे किसी को मैं भला समझा सकूँगी
मैं सिसकते इन स्वरों से कैसे मन बहला सकूँगी
ज़िंदगी की बाँसुरी पर गीत कैसे गा सकूँगी
मैं सिसकते इन स्वरों से कैसे मन बहला सकूँगी
ज़िंदगी की बाँसुरी...