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मिटटी जिस्म की गीली हो चली
मिटटी जिस्म की
खुश्बू इसकी रूह तक घुली
खुश्बू इसकी
इक लम्हा बनके आया है
इक लम्हा बनके आया है
संग ज़ख़्मों का वैध
मन बेक़ैद हुवा
मन बेक़ैद
मन बेक़ैद हुवा
मन बेक़ैद
रफ्ता रफ्ता मुश्किलें
अपने आप खो रही
इत्मीनान से काश्मकश कही जाके सो रही
दस्तक देने लगी हवा अब चटानों पे
ज़िंदा हो तोह किसका बस है अरमानों पे
कोई सेहरा बांधे आया है
साध ज़ख़्मों का वैध
मन बेक़ैद हुवा
मन बेक़ैद
मन बेक़ैद हुवा
मन बेक़ैद
अब तलक जो थे दबें
राज़ वो खुल रहे
दरमियान की फसलें
इक रंग में घुल रहे
दो साँसों से जली जो लौ अब वो खफ्फी है
मेरी भीतर कुछ न रहा पर तू बाकि है
इक कतरा बनके आया है
साध ज़ख़्मों का वैध
मन बेक़ैद हुवा
मन बेक़ैद
मन बेक़ैद हुवा
मन बेक़ैद