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मैं काबुल से लिपटी तितली की तरह मुहाजिर हूँ
एक पल को ठेहरु
पल मैं उड़ जाऊ
वे मैं तँ हूँ पगडण्डी लभदी ऐ जो राह जन्नत दी
तू मुड़े जहाँ मैं साथ मुद जाऊं
तेरे कारवां में शामिल होना चहुँ
कमिया तराश के मैं क़ाबिल होना चहुँ
वे की करा
वे की करा
रांझन दे यार बुलया
सुन ले पुकार बुलया
तू ही तोह यार बुलया
मुर्शिद मेरा
तेरा मुकाम कमले
सरहद के पार बुलया
परवरदिगार बुलया
हाफ़िज़ तेरा
मुर्शिद मेरा
जिस दिन से आशना से दो अजनबी हुवे हैं
तन्हाइयों के लम्हे सब मुल्तबी हुवे हैं
क्यों आज मैं मोहब्बत
फिर एक बार करना चहुँ
हां
मुझमे अगन है बाकी आज़मा ले
ले कर रही हूँ मैं खुद को तेरे हवाले
वे रांझना
वे रांझना
रांझन दे यार बुलया
सुनले पुकार बुलया
तू ही तोह यार बुलया
मुर्शिद मेरा
तेरा मुकाम कमले
सरहद के पार बुलया
परवरदिगार बुलया
हाफ़िज़ तेरा
मुर्शिद मेरा