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अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर
भगवान और खुदा आपस में बात कर रहे थे
मंदिर और मस्जिद के बीच चौराहे पर
मुलाक़ात कर रहे थे
के हाथ जोड़े हुए हो या दुआ में उठे
कोई फर्क नहीं पड़ता है
कोई मंत्र पढता है तोह कोई नमाज़ पढता है
इंसान को क्यों नहीं आती शर्म है
जब वह बंदूक दिखा कर पूछता है
की क्या तेरा धरम है
उस बन्दूक से निकली गोली न ईद देखती है न होली
सड़क पे बस सजती है बेगुनाह खून की रंगोली
भगवान और खुदा आपस में बात कर रहे थे
मंदिर और मस्जिद के बीच चौराहे पे
मुलाक़ात कर रहे थे सब को हम दोनों ने
इसी मिटटी से बनाया
कोई जन्मा अम्मी की कोख से
तोह कोई माँ की गोद में रोते आया
कौन है वह कमबख्त
जिसने नफरत का पाठ पढ़ाया किसी
अकबर को कहा माँ को मार
और अमर के हाथों अम्मी को मरवाया
ममता का गला घोंटने वाले बेवकूफों को
कोई समझाओ मज़हब की इस जंग में तुमने इंसानियत को दफनाया
भगवान और खुदा आपस में बात कर रहे थे
मंदिर और मस्जिद के बीच चौराहे पर मुलाक़ात कर रहे थे