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डर लगता है कि भटक ना जाऊँ
फिर भी इस भीड़ में खोना चाहूँ
पूछते हैं वो जो साथ चले थे
कुछ कह न दूँ जो मैं कहने से पछताऊँ
पर जब गलत सही, दिखे ही नहीं
तो जाने से, भला क्यों तरसती बेवजह तू
हर बार एक ही चीज़ ढूंढे वही हम
तो क्यों अब बुलाए पहले की तरह तू
क्यों तू ये भूल जाए कि मैं अब पहले की तरह ना हूँ
अब मंज़िल अलग है
अलग है सफर
अलग ही छत है
अलग ही है घर
रख रख कर पत्थर ही तो महल बनते हैं
इनका वज़न उठाना पड़ता है ना ये आसमान से गिरते हैं
तो क्यों कहे कि थक जाएंगे हम
गिर जाएंगे हम कभी भी
इतना भी क्या डरना गिरने से कि हम चलना ही बंद कर दें
पर जब गलत सही, दिखे ही नहीं
तो जाने से, भला क्यों तरसती बेवजह तू
हर बार एक ही चीज़ ढूंढे वही हम
तो क्यों अब बुलाए पहले की तरह तू
क्यों तू ये भूल जाए कि मैं अब पहले की तरह ना हूँ
अब मंज़िल अलग है
अलग है सफर
अलग ही छत है
अलग ही है घर
मेरा दिल चाहता है कि मैं अब ना झुकूँ
तेरे लिए अब मैं कभी ना मुडूँ
तो अब तू मत पूछ कि मैं हूँ कैसा और मैं हूँ कहाँ
मेरी दास्तां अब मैं कुछ ही लिख दूँ
तो क्यों अब बुलाए पहले की तरह तू
क्यों तू ये भूल जाए कि मैं अब पहले की तरह ना हूँ
तो क्यों अब बुलाए पहले की तरह तू
क्यों तू ये भूल जाए कि मैं अब पहले की तरह ना हूँ
अब मंज़िल अलग है
अलग है सफर
अलग ही छत है
अलग ही है घर