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ए रसमलाई, तू दिखाई दे रही लज़ीज़ सी है
नाम फिर क्यूँ ज़िंदगी है?
ए रसमलाई, तू नहाई बीते कल की चाशनी में
ख़्वाब के बादाम से सजी
क्यूँ काम-काज से ढकूँ मैं
वक़्त है, तुझे ज़ुबान पे रखूँ मैं, चखूँ मैं
ए रसमलाई
ए रसमलाई
अरे, ए रसमलाई, ओ-हो
ग़म की नमी में, गरम हँसी में
और मुलायम हो जाती है
कैसर वाली उमर की लाली
और भी रंगत ले आती है
क्यूँ ज़रा-ज़रा में हो गुज़ारा
है मज़ा, हलक में जब तुझे उतारा सारा
ए रसमलाई (ए रसमलाई)
ए रसमलाई (ए रसमलाई)
अरे-रे, रसमलाई (ए रसमलाई) ओ-हो
जो तेरे हर क़तरे को भी पी जाता है
वो बर्फीली वादी की ठंडक पाता है
क्यूँ ये हिसाब ना समझे कोई?
पहले क्यूँ ना प्यार से तुझे पुकारा
ना मिले किसी को भी तेरा नज़ारा दोबारा
ए रसमलाई (ए रसमलाई)
ए रसमलाई (ए रसमलाई)
अरे-रे, रसमलाई (ए रसमलाई) ओ-हो
ए रसमलाई
ए रसमलाई
ए रसमलाई, (ओ-हो)