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(यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत)
(अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्)
(परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्)
(धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे)
ओ, मोको कहाँ ढूँढे, रे बंदे? मैं तो तेरे पास में
ना तीरथ में, ना मूरत में, ना एकांत निवास में
ओ, ना मंदिर में, ना मस्जिद में, ना काबे, कैलाश में
मैं तो तेरे पास में, बंदे, मैं तो तेरे पास में
(ए-रे, बंदे रे)
ओ, खोजी होय, तुरत मिल जाऊँ, इक पल की तलाश में
कहत कबीर, "सुनो भई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में"
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
(परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्)
(धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे)
ओ, ना मैं जप में, ना मैं तप में, ना बरत, उपास में
ना मैं किरिया-करम में रहता, ना ही जोग, सन्यास में
(ना ही जोग, सन्यास में)
नहीं प्राण में, नहीं पिंड में, ना ब्रह्मांड, आकाश में
ना मैं प्रकृति, प्रवर गुफा में, ना ही स्वाँस की साँस में
ना ही स्वाँस की साँस में (ए-रे, बंदे रे)
ना ही स्वाँस की साँस में
ओ, खोजी होय, तुरत मिल जाऊँ, इक पल की तलाश में
कहत कबीर, "सुनो भई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में"
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
ओ, बंदा रे, मैं तो तेरे पास में
(...संभवामि युगे युगे)
(...संभवामि युगे युगे)
(...संभवामि युगे युगे)
(...संभवामि युगे युगे)
(...संभवामि युगे युगे)
(...संभवामि युगे युगे)