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रूह देखी है कभी
रूह को महसूस किया है
जागते जीते हुए दूधिया कोहरे से लिपट कर
साँस लेते हुए उस कोहरे को महसूस किया है
रूह देखी है कभी
या शिकारे में किसी झील पे जब रात बसर हो
और पानी के छपाकों में बजा करती हैं टल्लियाँ
सुबकियाँ लेती हवाओं के भी बैन सुने हैं
चौदहवीं-रात के बर्फ़ाब से इक चाँद को जब
ढेर से साए पकड़ने के लिए भागते हैं
तुम ने साहिल पे खड़े गिरजे की दीवार से लग कर
अपनी गहनाती हुई कोख को महसूस किया है
रूह देखी है कभी
जिस्म सौ बार जले तब भी वही मट्टी का ढेला
रूह इक बार जलेगी तो वो कुंदन होगी
रूह देखी है, कभी रूह को महसूस किया है