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Dharmik सच्चाई की आवाज़ को लेके
मेरेको अपनों की फिक्र है
तू किधर भटक गया, घर तेरा किधर है
मेरेको अपनों की फिक्र है
तू किधर भटक गया, घर तेरा किधर है
ज़िक्र ये अधिकतर है
जो ढूंढते बाहर, अक्सर मिलता वो भीतर है
मेरेको अपनों की फिक्र है
तू किधर भटक गया, घर तेरा किधर है
ज़िक्र ये अधिकतर है
जो ढूंढते बाहर, अक्सर मिलता वो भीतर है
कोई मियाँ बीवी नशे में मज़े में
शादी-शुदा रह के दूसरों के क़ब्ज़े में
शर्म से देख मर जा रे घरवाले
बच्चे भुगत रहे सो ज़िंदगी सज़े में common कर दे रे बाबू और शोना का रोना
बंद होना तो बिस्तर पे सोना हाँ
जो सगे नहीं खुद के माँ बाप के
वो तेरे क्या होंगे तू इतना तो सोचना था
आज generation youth icons के चक्कर में
खुद के घर के संस्कार भूली
शराब, जुआ, धुआँ, psychedelic चमड़ी
क्या मालूम कौन-कौन से नशों में डूब
कब तक सोते और क्या-क्या खोते
ग़लती नहीं रोके तो धोखे पे धोखे
दोस्त समझ के मैं समझा रहा हूँ
दोस्तों के माँ बाप देखा बेबस घुट-घुट के रोते
तेरे माँ बाप की फिक्र है
तू किधर भटक गया, घर तेरा किधर है
ये धूल तेरी glitter है
वो माँ बाप के चेहरे पे लांछन है
कीचड़ है, तेरे माँ बाप को फिक्र है
तू किधर भटक गया, घर तेरा किधर है
ज़िक्र ये अधिकतर है
बस पलट के आजा, घर अब भी वहीं पर है
भाई बाप बेटे हैवान हैं
दूसरों को छोड़ खुद के घर में हैं शैतान हैं
अकेली नारी पे जैसी नज़र जिसकी
ख़ुदा-ना-ख़ास्ता कोई आपके साथ दोहराना
शिक्षित ज़माना भगवान को नहीं माना
वेद-पुराण प्राचीन भारत की पहचान
लाशें खाना पेटों में श्मशान
एक-एक कौर भुगतेंगे पाप ऐसा पछताना
ज़िद्दी औरत है दोज़ख़ की सोहबत
जहाँ इज़्ज़त बस कचरा, धन-दौलत ही दौलत
घर की मंथरा चुप है जब तक मोहलत
आज सीता को वनवास बोल पूछेंगी सहूलत
औरत-बच्चों पे नामर्द हाथ उठाते
माँ बाप को मारते रुलाते नवाबज़ादे
किश्ती कर्मों की चुकाते-चुकाते
मौत की भीख माँगना, जीते-जी चिता पे
मेरेको दुनिया की फिक्र है
लेकिन दुनिया में पैसा, बस पैसों का ज़िक्र है
हवा पानी lethal है
करके कुदरत दफ़न इंसान क़ब्र खड़ी करे
ग़रीबी ज़मीन पर है
क्योंकि निखरती बेईमानी शिखर पे निडर है
भविष्य पे trigger है
जहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी निशाचर ही ईश्वर है
मेरेको अपनों की फिक्र है
तू किधर भटक गया, घर तेरा किधर है
ज़िक्र ये अधिकतर है
जो ढूंढते बाहर, अक्सर मिलता वो भीतर है
मेरेको अपनों की फिक्र है
तू किधर भटक गया, घर तेरा किधर है
ज़िक्र ये अधिकतर है
बस पलट के आजा, घर अब भी वहीं पर है