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कैसे हर बार करती है तू?
कैसे हर बार करती है तू?
तू ये सारी मुश्क़िलों को रफ़ू
ज़िंदगी जब-जब बिख़री लगे, तू आ जाए तह करे
आँखें मेरी जब फ़िकर जगाए, नींदें तू दे जाए
के जादू वाली कोई छड़ी तू घुमाए, फ़िकर जाए दूर
तू जहाँ चैन-सुकून की फ़सलें लहराएँ
कहीं ना और जो खिल पाएँ
जो भी देखे मेरी आँखें सपने तेरे भी
जो कमाऊँ तू भी पाए ख़ुशियाँ, ग़म भी
लुक-छुप के आस बहाए, पी जाए
तू कहाँ से इतनी ख़ुदाई जोड़ के लाए? कौन बताए?