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राम राम अली अली
राम राम अली अली
राम राम अली अली
राम राम अली अली
राम राम अली अली
राम राम अली अली
मान में है बस तू ही तू
आँखों में तेरा जलवा
काशी काबा में क्या ढूंडू
क्या तू राम क्या तू अल्लाह
अल्लाह… अल्लाह
कौन तू तेरा नाम क्या
क्या है मज़हब क्या ज़ुबान
क्या है तेरी सरहद
ये ज़मीन या वो आसमान
चाहत है तू ही इब्बादत है तू
मस्जिद शिवलो में फिर क़ैद है क्यूँ
तू तो वही है जो में चाहु
मनु तो अल्लाह ना मनु तो कुछ भी नही
यह दीवानगी, है बस नाम की
सोचो तो सही
क्या राम राम, क्या अली अली
फिर यह ज़िंदगी है क्या काम की
जो समझा नही
क्या राम राम, क्या अली अली
क्या राम राम, क्या अली अली
क्या तू यह है ये सोचता
कैसा है तेरा यह जहाँ ओ..
सहन ओ दिल क्यूँ तूने दिए
इन्न से मैं क्या किया
रूह तू रूह तू
चारों सू तू
फिर भी दर दर मैं तुझको ही ढूंडू
कशमकश है, क्या तू सच है
मनु तो ईश्वर ना मनु तो भूत है
यह दीवानगी है बस नाम की
सोचो तो सही
क्या राम राम, क्या अली अली
सब में है वोही, सब कुछ है वोही
बदला नाम ही
क्या राम राम, क्या अली अली
क्या राम राम, क्या अली अली
राम राम अली अली
यह दुनिया वो जन्नत
जो खुदा को खुद में पायें
ये मज़हब ये सरहद
इंसान के भरम सब
ये दीवारें कब तक हो कब तक पराए
तो जान ले, पहचान ले
रब के हम सब बंदे हैं
रब है राम और अली भी
ओह हूओ
सबसे उँची मोहब्बत है
माने तो इंसान ना माने है अजनबी
यह दीवानगी है बस नाम की
सोचो तो सही
काफ़िर ज़िंदगी है किस काम की
जो समझा नही
यह दीवानगी है कुछ भी नही
सोचो तो सही
काफ़िर ज़िंदगी है किस काम की
जो समझा नही
सब कुछ है वोही, सब में है वोही
बदला नाम ही
वो राम राम वो अली अली
हे वो कुछ नहीं हे वो कुछ नहीं
हे वो एक वही
वो राम राम.. वो अली अली
वो राम राम वो अली अली
वो राम राम वो अली अली